मस्जिदों और कब्रिस्तानों में रौशनी, जलसों का आयोजन; प्रमुख धार्मिक स्थलों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था
बरेली। हज़रत उबैश क़रनी सादिक़ रज़ि. की याद में मनाया जाने वाला मुक़द्दस पर्व शबे-बारात मंगलवार को जिले भर में पूरी अकीकत, एहतराम और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस मौके पर शहर की तमाम मस्जिदों और कब्रिस्तानों को रौशनी से सजाया गया, जबकि कई स्थानों पर रात भर जलसों और इबादत का सिलसिला जारी रहा।
शबे-बारात के मद्देनज़र शाही जामा मस्जिद, दरगाह क्षेत्र और अन्य प्रमुख मस्जिदों के आसपास सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए। शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस फोर्स तैनात रही और देर रात तक निगरानी की गई।
गुनाहों से माफी की रात
इस्लामी मान्यताओं के अनुसार ‘शब’ का अर्थ रात और ‘बारात’ का अर्थ बरी होना या निजात पाना है। इसे गुनाहों से माफी की रात माना जाता है, क्योंकि ऐसी आस्था है कि इस रात अल्लाह अपने बंदों की सच्चे दिल से की गई तौबा को कबूल फरमाता है और उन्हें जहन्नुम से निजात अता करता है।
तक़दीर के फैसले की रात
मान्यता है कि शबे-बारात की रात अल्लाह आगामी वर्ष के लिए इंसान की तक़दीर से जुड़े फैसले जैसे जिंदगी, मौत और रिज़्क लिखता है। इसी कारण यह रात दुआ और इबादत के लिहाज से बेहद अहम मानी जाती है।
इबादत, तिलावत और दुआ
इस मौके पर मुसलमान पूरी रात जागकर नमाज़ अदा करते हैं, कुरआन की तिलावत करते हैं और अपने साथ-साथ मुल्क व समाज की भलाई के लिए दुआएं मांगते हैं। बड़ी संख्या में लोग कब्रिस्तानों में पहुंचकर अपने दिवंगत पूर्वजों की कब्रों पर फातिहा पढ़ते नजर आए।
शिया समुदाय के लिए विशेष महत्व
शिया समुदाय के लिए शबे-बारात का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन उनके बारहवें इमाम हज़रत इमाम मेहदी का जन्म हुआ था। इस अवसर पर शिया इलाकों में भी धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
खैरात और पारंपरिक पकवानश
बे-बारात पर गरीबों को खैरात देना और हलवा सहित अन्य पकवान बनाकर बांटना भी एक पुरानी परंपरा है, जिसे लोगों ने निभाया।
शाही जामा मस्जिद में जलसा
शहर की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद में पेशे इमाम मौलाना मोहम्मद इजहार खां बरकाती की देखरेख में रात आठ बजे से देर रात्रि तक विशेष जलसे का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अकीदतमंदों ने शिरकत की।
Author: विकास यादव
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