छठ पूजा, जिसे सूर्य षष्ठी या छठी माई पूजा भी कहा जाता है, सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का पर्व है जो प्रमुख रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में मनाया जाता है। यह पर्व सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके जीवनदायी प्रकाश और ऊर्जा के लिए आभार प्रकट करने के रूप में मनाया जाता है ।

●छठ पूजा (जिसे सूर्य षष्ठी या डाला छठ भी कहा जाता है) दिवाली के छह दिन बाद मनाई जाती है।
●छठ पूजा का धार्मिक महत्वछठ पूजा में भक्त सूर्य देव और उनकी बहन छठी मैया की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्य की कृपा से जीवन में स्वास्थ्य, समृद्धि और संतान की दीर्घायु प्राप्त होती है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है जिसमें अस्त होते और उदय होते सूर्य दोनों को अर्घ्य दिया जाता है — इसका अर्थ है जीवन के दोनों पहलुओं, आरंभ और अंत, के प्रति समान सम्मान प्रकट करना ।
●ऐतिहासिक और पौराणिक कथाछठ पर्व की उत्पत्ति प्राचीन वैदिक काल से जुड़ी मानी जाती है, जब ऋषि-मुनि सूर्योपासना के माध्यम से अपने शरीर और मन को शुद्ध करते थे। पुराणों के अनुसार, राजा प्रियंवद ने संतान प्राप्ति की इच्छा से देवी षष्ठी की पूजा की, जिससे उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। इसके बाद से छठी मैया की पूजा का प्रचलन शुरू हुआ ।
●इसके अलावा, द्वापर युग की कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ था, जो सूर्य देव की पूजा करने से ठीक हुआ। उसी घटना के बाद साम्ब ने 12 सूर्य मंदिरों की स्थापना की, जिनमें कोणार्क सूर्य मंदिर भी शामिल है ।
●प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ावयह पर्व मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन और सामंजस्य का प्रतीक है। सूर्य के प्रति श्रद्धा के माध्यम से लोग जीवनदायिनी ऊर्जा, पर्यावरण और जल के प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। यह त्योहार स्वच्छता, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का भी प्रतीक है, जिसमें भक्त 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर मानसिक और शारीरिक शुद्धि प्राप्त करते हैं ।
■संक्षेप में, छठ पूजा जीवन, प्रकृति और अध्यात्म का अद्भुत संगम है जो सूर्य की उपासना के माध्यम से कृतज्ञता, आत्मसंयम और सामूहिक सद्भाव का संदेश देता है।




