आपातकाल से आज तक: लोकतंत्र की चुनौतियाँ

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संजीव मेहरोत्रा: 25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह दिन है जब देश में आपातकाल लागू हुआ। प्रेस पर सेंसरशिप लगी, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। यह लोकतंत्र के लिए एक कठिन दौर था।

आज, 50 वर्ष बाद, आपातकाल की स्मृति हमें केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान का मूल्यांकन करने के लिए भी प्रेरित करती है। यद्यपि आज औपचारिक आपातकाल नहीं है और लोकतांत्रिक संस्थाएँ कार्यरत हैं, फिर भी नागरिक स्वतंत्रताओं, अभिव्यक्ति की आज़ादी, मीडिया की स्वतंत्रता और असहमति और ट्रेड यूनियंस के अधिकार को लेकर समय-समय पर चिंताएँ व्यक्त की जाती हैं।

उमर खालिद जैसे मामलों में लंबी न्यायिक प्रक्रिया तथा कठोर कानूनों के उपयोग पर बहस होती रही है। इसी प्रकार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर भी सार्वजनिक चर्चा जारी है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि वर्तमान परिस्थितियाँ बिल्कुल 1975 जैसी हैं, क्योंकि दोनों दौरों की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। फिर भी लोकतंत्र की मजबूती का आकलन केवल चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों, न्यायिक निष्पक्षता, स्वतंत्र मीडिया और असहमति के सम्मान से किया जाता है।

आपातकाल की वर्षगांठ हमें यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा निरंतर सतर्कता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता से ही संभव है।

संजीव मेहरोत्रा महामंत्री बरेली ट्रेड यूनियंस फेडरेशन

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